सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

गुरुवार, 3 मार्च 2022

#गुरुमन्त्र #अंधविश्वास #दीक्षा

 अंधविश्वास एवं अंध परंपरा* सुंदर कथा।अवश्य पढ़े।

एक गांव मे अंधे पति-पत्नी रहते थे।*  इनके यहाँ एक सुन्दर बेटा पैदा हुआ। 

*पर वो अंधा नही था।*


एक बार पत्नी रोटी बना रही थी। उस समय बिल्ली रसोई में घुस कर बनाई रोटियां खा गई।


*बिल्ली की रसोईं मे आने की रोज की आदत बन गई इस कारण दोनों को कई दिनों तक भूखा सोना पड़ा।*


एक दिन किसी प्रकार से मालूम पड़ा कि रोटियाँ बिल्ली खा जाती है।


*पत्नी जब रोटी बनाती उस समय पति दरवाजे के पास बाँस का फटका लेकर जमीन पर पटकता।*


इससे बिल्ली का आना बंद हो गया।


जब लङका बङा हुआ और उसकी शादी हुई।


*बहू जब पहली बार रोटी बना रही थी तो उसका पति बाँस का फटका लेकर बैठ गया औऱ फट फट करने लगा।*


कई दिन बीत जाने के बाद पत्नी ने उससे पूछा कि तुम रोज *रसोई के दरवाजे पर बैठ कर बाँस का फटका क्यों पीटते हो?*


पति ने जवाब दिया कि


*ये हमारे घर की परम्परा (रिवाज) है इसलिए मैं ऐसा कर रहा हूँ।*


*माँ बाप तो अंधे थे, जो बिल्ली को देख नहीं पाते थे, उनकी मजबूरी थी* इसलिये फटका लगाते थे। पर बेटा तो आँख का अंधा नही था *पर अकल का अंधा था*


इसलिये वह भी वैसा करता था जैसा माँ-बाप करते थे।


*ऐसी ही दशा आज के अपने हिन्दू समाज की है।*


#दीक्षा लेने की परंपरा।


 कोई भी व्यक्ति जब दीक्षा अर्थात #गुरुमंत्र लेता था तो विचारकर बड़े ही योग्य गुरु से ही दीक्षा लेता था। जो अब परम्परा बन गई उसके कुल के आगे के भी लोग उसी गुरु के शिष्य यदि सन्यासी हो अथवा पुत्र यदि गृहस्थ हो। अब वह  पुत्र /शिष्य अयोग्य ही क्यों ना हो उसी से ही दीक्षा लेते हैं चाहे वह मूर्ख अनपढ़ गवार जाहिल तमस में ही रत रहने वाला वेद शास्त्र को न जानने वाला ही क्यों ना हो। जब इस तरह का गुरु होगा तो हिंदू धर्म का कितना विकास हो सकता है आज इसी रूढिबादी अथवा धर्मांध परंपरा के चलते ऐसे मूर्खों को भी  गुरु बना लेते हैं और उनकी मूर्खतापूर्ण बातों का समर्थन भी करते हैं चाहे वह शास्त्र सम्मत हो या ना हो और उनके मूर्खतापूर्ण व्यवहार और आचरण के ही कारण आज हिंदू समाज अपने पतन की तरफ बढ़ता चला जा रहा है ।हमें इस परम्परा को तोड़कर के एक योग्य गुरु की खोज करनी चाहिए।

मैं स्वयं अपने उस कुल परंपरा को तोड़कर के योग्य गुरु के द्वारा दीक्षा को प्राप्त किया हूँ।यदि मैं अपनी कुल परंपरा के गुरु से दीक्षा प्राप्त करता जिनको न हीं संस्कृत का ज्ञान है न हीं वेद शास्त्रों का ज्ञान है न हीं संध्या वंदन करते हैं न हीं भगवान की आराधना करते हैं तो मेरा कितना उद्धार हो सकता था  । आप विचार कर सकते है ।इसलिए इस परंपरा को मैंने तोड़ा और आप सब लोगों से भी आग्रह है इस  रूढि वादी परंपरा को अवश्य ही तोड़े किसी योग्य गुरु से ही दीक्षा ले। जिनके मार्गदर्शन से आप का कल्याण हो सके।


गुरु के द्वारा ही भागवत कथा सुनने की परंपरा।


यदि गुरु योग्य है तो कथा श्रवण करा रहा है अच्छी बात है उससे श्रवण करना चाहिए किंतु यदि गुरु योग्य नही  है अथवा श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का प्रवचन नहीं कर सकता है ।और वह अपने माध्यम से ही किसी कथावाचक को भेजता है आप बरबस हो करके उससे ही कथा सुनते हैं। चाहे वह योग्य हों अथवा अयोग्य हों।और वह गुरु भी उसी कथावाचक को भेजेगा जिससे उसे कुछ धन लाभ हो सके ।ऐसे गए हुए कथावाचक कथा कराने वाले लोगों का भरपूर शोषण करते हैं। शोषित यजमान को  भी धर्म के प्रति अश्रद्धा होने लगती है। यजमान को चाहिए कि जिस की कथा उसके समझ में आ रही हो उसी से ही कथा उसे श्रवण करनी चाहिए। तभी भागवत महापुराण का फल भी उसे प्राप्त हो सकता है ।और धर्म के प्रति उसकी श्रद्धा भी बढ़ सकती है। जो गुरु कथा कहना नहीं जानता है तो उससे कदापि इस संबंध में राय नहीं लेनी चाहिए। अपनी इच्छा के अनुसार जिस की कथा अच्छी लगे उससे ही कथा श्रवण करनी चाहिए। परीक्षित जी के गुरु दूसरे थे लेकिन कथा उन्होंने सुकदेव जी से सुनी ।शौनक आदि मुनियों के गुरु दूसरे थे किंतु उन्होंने सूत जी से ही कथा सुनी जो कथा को जानता है उसी से कथा श्रवण करनी चाहिए। इस प्रकार के अनेकों अंध परंपराओं का लोगों को त्याग करना चाहिए तभी उन्हें धर्म का यथार्थ बोध होगा और उनका कल्याण होगा हम सब मिलकर के इस अंध परंपरा को तोड़ने का प्रयास करें जिससे हमारे सनातन धर्म का विकास हो सके 

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