🕉️ #विधवाविवाह_विधिनिषेधसङ्गति🕉️🚩
श्रीराम!
पुनर्विवाहके विषयमें वर्तमानमें बहुत विचार होताहै। पूर्वमें भी हुएहैं। दोनों विचारोंमें कुछ मौलिक भेदहैं। आधुनिक महिला उद्धारक आत्माके सनातन अस्तित्व को दृष्टि में न रखते हुए केवल वर्तमान जन्म के ही अनिश्चित दश बीस वर्षोंके सुख को उद्देश्य करके ही विचार व विधान करतेहैं।
पूर्वके विचारक ऋषिगण आत्माके सनातन अस्तित्वको दृष्टिमें रख कर ही उस अनन्त कालिक सुख शान्तिको उद्देश्य ( लक्ष्य) करके उसके अनुरूप साधनों का विचार व विधान करते हैं।
आधुनिक चार दिन सुख भोगका विचार विधान करके आगे अनन्तकालीन सुख शान्तिको उपेक्षित करतेहै। दूसरे अनन्तकालीन सुख शान्ति का विचार विचान करते हुए तात्कालिक सुख भोग का भी विचार विधान करतेहैं। विपरीत विपरीत परिस्थितियोंमें अनन्त काल तक सुखी होनेके लिए चार दिन थोड़ा कष्ट उठा लेनेकी प्रेरणा देतेहैं।
आधुनिकोंका विचार व विधान केवल विषय सुख तक ही केन्द्रित रहताहै, ऋषियोंके विचार व विधान शास्वत् सुख शान्ति पर केन्द्रितहैं।
इस प्रकार उद्देश्यमें ही जब कि भेदहै, तो विचार व विधानमें भेद होना स्वाभाविक है। अब विचार हमें करनाहै कि-- चार दिनके अनिश्चित सीमित मिश्रित सुख केलिए चौरासीलाख का वरण करतेहैं, या अनन्तसुखके लिए चार दिन का तप त्याग आराधनामें सार्थक उपयोग करतेहैं।
विधवा माताओंके विषयमें भी ऋषियों ने जो विचार विधान किया है वह यथामति श्रुति इस प्रकार है:--
शास्त्रोंमें कुछ वचन ऐसे मिलतेहैं, जिनसे प्रतीत होताहै कि विधवा स्त्रीका पुनर्विवाह शास्त्रविहित है। अनेक वचन ऐसे प्राप्त होतेहैं, जिनसे प्रतीत होताहै कि विधवा का पुनर्विवाह शास्त्रनिषिद्धहै।
*विधान* १
*'नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीबे च पतिते पतौ
पञ्चस्वापत्सु नारीणां पतिरन्यो विधीयते।। ' (अग्नि पु० १५४।५) (गरुड़ पु. १०७/२८) (पाराशर स्मृति ४१३०)
(विष्णुधर्मो.पु० २/८७/११/३)
अर्थ:--यदि पति अदृश्य या मृत हो जाये या संन्यास ले ले, या पतित हो जाये या नपुंसक हो, तो इन पाँच आपत्तियोंके आने पर स्त्री का दूसरा पति विहित है।
२--
'पाणिग्राहे मृते बाला केवलं मन्त्रसंस्कृता।
सा चेदक्षतयोनिः स्यात् पुनः संस्कारमर्हति।।
(वसिष्ठस्मृ. अ० १७)
अर्थ-- केवल मन्त्रों द्वारा विवाह संस्कार जिस कन्या का किया गया है, उस कन्याका पति मर जाने पर यदि वह अक्षतयोनिहै तो उसका पुनः विवाह संस्कार करना योग्य है।
*निषेध*-
*१.
*न विवाहविधायुक्तं विधवादेवनं पुनः'।
(मनु० ९।६५).
अर्थ:-- विधवा स्त्रीके लिए दूसरे विवाह का विधान नहीं है।
२.
नामापि नैव गृह्णीयात् पत्यौ प्रेते परस्य तु।।(मनु० ५।१५७)
अर्थ-- पत्ति के पर जाने पर दूसरे पुरुष का नाम भी नही लेना चाहिये। (सृङ्गार भाव से)
इस प्रकार परस्पर विरुद्ध प्रतीत होने वाले उभय पक्ष समर्थक वचन होने से यहाँ सङ्गति लगानेकी आवश्यकताहै।
*सङ्गति--
*१. अङ्कमें उद्धृत पाराशरस्मृति आदिमें जो पाँच आपत्तियोंमें दूसरे पतिका विधान किया गया है, वह विधान उस कन्याके विषयमें ही है जिसके दान देने का केवल जल लेकर सङ्कल्पमात्र किया गया हो, अथवा वचनसे देने की प्रतिज्ञामात्र की गई हो। विधिवत सम्पूर्ण विवाह संस्कार द्वारा विवाहिता के लिए दूसरे पतिके विधानमें पाराशर स्मृति का तात्पर्य नहीं है। क्योंकि अपरार्क स्मृतिचन्द्रिका में तथा वासिष्टस्मृति में कहा गया है--
'अद्भिर्वाचा च दत्तानां म्रियेताथो वरो यदि। अन्यस्मै विधिवद् देया यथा कन्या तथैव सा। ( वशिष्ठ स्मृ.१७)
अर्थ--जल तथा वाणीसे दान की हई कन्या का याद पति पर जाये, तो विधिपूर्वक दूसरे को देना चाहिए जैसे कन्या होती है वैसी ही वह भी है।
अङ् २ में वसिष्ठ जी ने जो मन्त्रों द्वारा पाणिग्रहण हो जाने पर भी पतिके मरने पर पुनः विवाह संस्कार की आज्ञा दी है, वह आज्ञा भी उसीके लिए है जिसकी योनि अक्षतहै-अर्थात् जिसके साथ पतिने मैथुन नहीं किया हो। यही बात पद्मपुराणमें भी स्पष्ट शब्दोंमें कही गई है--
विवाहो जायते राजन् कन्यायास्तु विधानतः । पतिर्मृत्युं प्रयात्यस्या नो चेत् सङ्गं करोति च।।(प पु. भूमिखण्ड ८५/६३/ ५ /९२/४५) अर्थ--हे राजन, जिसका पति मर गया हो उसने यदि पतिके साथ मैथुन नहीं किया उस कन्या का दूसरा विवाह विधिपूर्वक किया जा सकताहै।
विधिवत् विवाहिता अक्षतयोनिवाली कन्याका दूसरा विवाह इसलिए उचित माना गया है कि विवाहके बाद चौथे दिन *चतुर्थीहोम* मन्त्रों द्वारा चौथी रातमें पुरुष के साथ त्वचा, मांस, हृदय तथा इन्द्रियोंसे संयुक्त होकर जब मैथुन करतीहै तभी पति के गोत्रसे एक होतीहै। इससे पूर्व तो अनन्यपूर्विका (अर्थात् अभी तक किसी अन्य गोत्र की नहीं हुई) होती है, अर्थात् पिताके गोत्र की होतीहै। इसलिए उसका दूसरा विवाह हो सकताहै। ये सब बातें नीचे लिखे स्मृतिवचनोंमें स्पष्ट कहीहैं--
'विवाहे चैव निवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु। एकत्वभागता भर्त्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके।।
(लिखित स्मृ० २५)
चतुर्थीहोममन्त्रेण त्वङ्मांसहृदयेन्द्रियैः।
भर्त्रा संयुज्यते पत्नी तद्गोत्रा तेन सा भवेत्।। (बृहस्पति)
अर्थ--विवाह हो जाने पर चौथे दिन, रात्रिमें पतिके पिण्ड, गोत्र तथा सूतक में एकता को प्राप्त होतीहै। चतुर्थीहोम मन्त्रों द्वारा त्वचा, मांस, हृदय और इन्द्रियोंसे पतिके साथ पत्नी संयुक्त होतीहै, इस कारण पतिके गोत्रवाली वह हो जातीहै।
निष्कर्ष--द्विजोंमें विधवा-विवाह विचार का सार यह है कि केवल जल या वाणीसे दी हुई वाग्दत्ता अविवाहिता कन्याका तथा अक्षतयोनि विवाहिता कन्याका भी पति की मृत्यु हो जाने पर दूसरा विवाह किया जा सकताहै, क्षतयोनिका नहीं।
कुछ विद्वानोंका कहना है कि अक्षतयोनि ( जिसका पुरुष से सम्बन्ध न बना हो) उस विधवाका भी पुनर्विवाह न करना ही विशेष कल्याणकारी है, क्योंकि कलियुगमें उसका भी निषेध कलिवर्य प्रकरणमें कियाहै--
'दत्ताऽक्षताया कन्यायाः पुनर्दानं परस्य च। 'उढायाः पुनरुद्वाह्ये ज्येष्ठाशो गोवधस्तथा।।
ब्रह्मचर्य-पालनमें असमर्थ विधवाका अनके पुरुषोंसे गुप्त सम्बन्ध रखनेकी अपेक्षा एकके साथ प्रगट सम्बन्ध रखना अच्छाहै। किन्तु इनकी संस्था अलगहो तथा पुत्र-पुत्रियोंके विवाह खान, पान आदि उसी संस्थाके साथ हों, शुद्ध द्विजोंके साथ नहीं। यह सब विचार पूज्यपाद श्रीकरपात्रीजी द्वारा लिखित "चातुर्वर्ण्यसंस्कृतिविमर्श" नामक ग्रन्थमें 'विधवाविवाह' नामक शीर्षकमें विस्तारपूर्वक कियाहै। यह ग्रन्थ संस्कृतमें है।
एक विशेष निवेदन और है-- विधवा माताओं का पालन पोषण खूब भलीभाँति करुणा आदर सम्मान के साथ करना चाहिए। यदि ये मर्यादानुसार जीवन यापन करतीं हैं तो एक तपोनिष्ठ सदाचारी सन्यासी के समान इनका सम्मान व करना चाहिए, इनसे आशीष लेना चाहिए। बड़े आयोजनों या श्रृंगारिक वातावरण में केवल वातावरण के कारण होने वाली उत्तेजना राग से बचने के लिए ठीक वैसे ही निषिद्ध है जिसे किसी सन्यासी या नैष्ठिक ब्रह्मचारी को विवाह आदि रंगारंग कार्यक्रमों में भाग लेना निषिद्ध है, न कि कोई अशुभ होने से। इनके दर्शन से न तो कोई अशुभ होता है, और न ही कोई ऐसी शास्त्रीय व्यवस्था है।